Monday, August 17, 2020

नज़रिया

साथ वर्ष पहले ऐशबाग में हम मोबाइल लाइब्रेरी के द्वारा बच्चों से जुड़ने की कोशिश कर रहे थे. एक दोस्त की सेकंड हैंड वेन, कुछ युवा वालंटियर्स और हम ...रोज़ का एक ही रूटीन, गाडी में किताबें और खिलोने भरकर अलग अलग बस्तियों में जाना. वहां लाइब्रेरी लगाना, बच्चों के साथ रीडिंग करना, कहानी कविता गीत सुनाना, खेलना, खूब मज़े करना. 3-4 बस्ती में जाते और हर बस्ती में 30 के करीब बच्चे जुड़ते. ये काफी इंटरेस्टिंग फेज था, जहाँ हम प्रयोग करके देख रहे थे, बच्चों से जुड़ रहे थे. 

ट्रेवल और वालंटियर्स की सैलरी का मुद्दा उठने लगा. डोनर्स ढूंढ़ने की प्रक्रिया शुरू हुई. एक बड़े डोनर को हमारा काम अच्छा लगा. "प्रोजेक्ट बेस्ड वर्क" की शुरुआत हुई और बच्चों के साथ organic तरीके से जो काम हम ख़ुशी ख़ुशी करते थे वो एक बड़े से रिजल्ट बेस्ड मैट्रिक्स में क़ैद हो गया. कई सारे सेंटर्स खुले, बच्चों के लिए खूब पैसा आया. उनके लिए कई संसाधन उपलब्ध होना शुरु हुआ - स्पोर्ट्स का सामान, खिलोने, किताबें, एक्सपोज़र विजिट, सेशन और ना जाने क्या क्या... 

बच्चों ने भी खूब सहभागिता दिखाई. उन्होंने अपना एक पब्लिकेशन निकाला - नन्हे लेखक नाम से. बच्चों की बातें, उनकी ज़ुबानी यही फोकस रहा इस छोटे से प्रयास का. जो मज़दूर बच्चे लिखना नहीं जानते थे, उनकी कहानियाँ रिकॉर्ड कर कार्यकर्ता लिखने की कोशिश करते. प्रिंट भी हुए. बच्चे गर्व से कहते, "ये मेरी कहानी हैँ. ये मैंने लिखा हैँ."

बच्चों ने अलग अलग मंच पर गीत, नाटक, कविता, स्पीच, लेखन,चित्रकला और अन्य कई माध्यम के द्वारा अपनी बात को साझा किया. माध्यम के साथ बच्चों को जोड़ना हमारे लिए भी सीखने की प्रक्रिया रही. मज़दूर बच्चा अमन ने पहली बार डिजिटल कैमरा से अपने बस्ती को कैप्चर किया. बढ़िया फोटोग्राफी के साथ हमें बच्चों के नज़र से बस्ती के मुद्दों को समझने का मौका मिला. मेरे लिए यही प्रयोग सबसे खूबसूरत रहे. साथी संस्था भी बच्चों के अभिव्यक्ति के अवसर बनाने और बढ़ाने के लिए काफी प्रोत्साहित रहे. मिलजुलकर काफी काम हुआ. पांच साल ये सिलसिला चला..

फिर एक समय आया जब तय करना था हमारे संघठन को - क्या इस तरह के प्रोजेक्ट बेस्ड approach से हम वाकई में बच्चों की ज़िन्दगी में कोई बदलाव ला पा रहे हैँ? समुदाय में किस तरह के काम की जरूरत हैँ? इस काम के लिए कितने पैसों की जरूरत हैँ? क्या ये काम ज्यादातर सामुदायिक सहभागिता से नहीं हो सकता ? क्या बच्चों के प्रोटेक्शन के मुद्दे में कोई प्रोग्रेस हुआ हैँ ? संगठनात्मक काम या प्रोजेक्ट - किस प्रक्रिया में अपनी ऊर्जा, सोच, समय लगाए? क्या हमें "प्रोफेशनल" काम की जरूरत हैँ, अपने आप को प्रोफेशनल कहने वाले सोशल वर्कर की जरूरत हैँ या फिर सामाजिक बदलाव और संघर्ष में विश्वास करनेवाले कार्यकर्ताओं की जरूरत हैँ...

खैर. लोकल वालंटियर्स और कार्यकर्ताओं को लेकर काम आगे बढ़ा. आज भी पैसों के लिए संघर्ष करना पड़ता हैँ. लेकिन सबसे बड़ी उपलब्धि हैँ की हम अपने तरीके का काम, समुदाय के सुझाव अनुसार, लोकल युवाओं और अन्य वालंटियर विशेषज्ञ के साथ कर रहे हैँ. और मज़े से कर रहे हैँ! Accountability सामुदाय और बच्चों के तरफ हैँ, बाहर के किसी डोनर को नहीं.काफी मज़ेदार सफर हैँ. रोज़ नयी कहानी. रोज़ नये सवाल, नई चुनौतियां... 🙂

जरूरत के आधार पर समुदाय के साथ मिला जुला काम और बाहर से लाये गए प्रोजेक्ट का मुख्य अंतर autonomy का हैँ. बदलाव के प्रक्रिया की दिशा, गति और फोकस को निर्धारित करने और आगे बढ़ाने का प्राथमिक हक्क उसी समुदाय का हैँ जो इन मुद्दों से झूंझ रहा हैँ. मेरे ख्याल से बाहर के लोग सहजकर्ता की भूमिका निभा सकते हैँ. लेकिन अधिकतर कार्यकर्ता "एक्सपर्ट" होने का भ्रम पालते हैँ और समुदाय को अपने बोरिंग प्रवचन से ग्रस्त कर देते हैँ. सामूहिक प्रक्रिया का सत्यानाश होना बस यही से शुरु होता हैँ. इन एक्सपर्ट से कैसे बचे! 

हम सीख रहे हैँ. बाहर से आए हुए लोग और बस्ती के लोग क्या मिला जुला काम कर सकते हैँ? कैसे? क्या प्रक्रिया होंगी? किसका निर्णय, किसकी भागीदारी? संसाधन कहाँ से इक्कठा करेंगे? इसे संचालित कौन करेंगे? हम यहाँ कितने वर्ष रहेंगे...

आज बच्चा रसोई में तीन युवा वालंटियर्स रोज़ 30 बच्चों का खाना बनाते हैँ. और उन्हें प्यार से खिलाते हैँ, उनके साथ बातें करते हैँ. ये 30 बच्चे हाशिए पर रहने वाले परिवार के हैँ. कोविद ने इनको और भी खतरे में धकेल दिया हैँ. बच्चा रसोई के लिए राशन अलग अलग लोग भेजते हैँ. अनियमित आर्थिक सपोर्ट के वजह से कभी दो तीन दिन रसोई बंद भी करना पड़ता हैँ...बच्चे धीरज रखते हैँ और बड़े फिर जुगाड़ में लग जाते हैँ. रास्ते निकल आते हैँ.

संघठन के दूसरे काम जारी हैँ. एक सिंगल डोनर के बजाय कई लोग मिलकर इस काम को सपोर्ट करते हैँ. हम आज जो कर रहे हैँ, हमारे बच्चे देख रहे हैँ. उनके लिए और अपने आप के लिए भी, यही सामूहिक, वोलंटरी काम करने का तरीका हमारे लिए ठीक रहा...

Friday, March 20, 2015

Chingaari


















While I falter, she makes a resolve.
And then weighing the possibilities
Of being stared at by hundreds
Or of finding her wings
She, the flame of the forest
Takes a step forth
Clutching the hands of one like herself

The skies open out to her...

Thursday, March 19, 2015

Eka!






































ना हो कुछ भी 
सिर्फ सपना हो 
तो भी हो सकती हैं शुरुवात 
और यह एक शुरुवात ही तो हैं 
 की वहाँ एक सपना हैं...